श्री राम और शबरी की भक्ति — प्रतीक्षा का अमर फल

श्री राम और शबरी की भक्ति: दंडकारण्य वन का एक कोना, जहाँ साधारण जन कभी साहस नहीं करते थे, वहीं एक वृद्ध वनवासी महिला रहती थी—शबरी।
उसका जीवन बिल्कुल सरल था, पर उसका हृदय भक्ति से भरा हुआ था।
🌿 गुरु मतंग ऋषि और शबरी की सेवा
जो लोग अनछुए, अस्पृश्य माने जाते थे, शबरी उन्हीं में जन्मी थी।
पर मतंग ऋषि ने उसे अपने आश्रम में स्थान दिया।
वह प्रतिदिन आश्रम की सफाई करती, सभी शिष्यों की सेवा करती और रात को गुरुदेव के चरणों में बैठकर आध्यात्मिक ज्ञान सुनती।
एक दिन मतंग ऋषि ने शबरी से कहा—
“शबरी, एक समय आएगा जब स्वयं भगवान राम तुम्हें दर्शन देंगे।
जीवन भर प्रतीक्षा करना, वे अवश्य आएँगे।”
यह वचन शबरी के हृदय में सूर्य की तरह चमक गया।

🌿 श्री राम और शबरी की भक्ति: प्रतीक्षा के वर्षों की कथा
मतंग ऋषि स्वर्ग सिधार गए, पर शबरी की भक्ति और प्रतीक्षा और भी दृढ़ हो गई।
वह प्रतिदिन वही सेवा करती—
- मार्ग साफ करती
- फूल चुनती
- छोटे-छोटे बेर इकट्ठे करती
- वन की शांतता में राम के नाम का जप करती
हर सुबह वह सोचती—
“शायद आज प्रभु आएँगे।”
🌿 राम का आगमन
वन में राक्षसों का संहार करते हुए राम और लक्ष्मण आश्रम पहुँचे।
जैसे ही शबरी ने उन्हें देखा, वह भावविभोर होकर उनके चरणों में लिपट गई।
राम ने प्रेम से कहा—
“माता, उठो! तुम्हारी भक्ति ने हमें यहाँ खींचा है।”
शबरी ने उन्हें बैठाया, पैर धोए, और अपना पूजा किया हुआ जल अर्पित किया।
🌿 चखे हुए बेर—प्रेम की परीक्षा
शबरी ने बेर लाकर दिए, पर वह हर बेर को पहले चखकर देखती थी कि कौन सा मीठा है—क्योंकि वह राम को केवल श्रेष्ठ ही देना चाहती थी।
लक्ष्मण यह देखकर चकित हुए।
उन्होंने कहा—
“माताजी, यह तो चखा हुआ है…”
राम मुस्कुराए और बोले—
“लक्ष्मण, इन फलों में माँ का प्रेम है। यही मेरे लिए अमृत है।”
शबरी उस क्षण रो पड़ी—इतनी भक्ति की किंतु इतनी विनम्रता कभी न देखी।
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🌿 शबरी निर्वाण
राम ने कहा—
“माता, अब तुम्हारा जीवन-साध्य पूर्ण हो गया।
भगवत-भक्ति तुम्हें परम लोक प्रदान करेगी।”
शबरी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उसी क्षण उसी स्थान पर दिव्य प्रकाश में लीन हो गई।
आज भी वह स्थान “शबरी धाम” के नाम से प्रसिद्ध है।
⭐ शिक्षा:
- भगवान प्रेम देखते हैं, वस्तु का मूल्य नहीं।
- भक्ति में जाति, अवस्था, गरीबी—सब अप्रासंगिक है।
- धैर्य से की गई प्रतीक्षा का फल अवश्य मिलता है।
शबरी की यह पवित्र कथा हमें सिखाती है कि भगवान तक पहुँचने का मार्ग न धन से बनता है, न योग्यता से—
बल्कि निर्मल हृदय, सच्ची श्रद्धा और धैर्य ही वह साधन हैं, जो भगवान को अपने भक्त की ओर खींच लाते हैं।
वर्षों की प्रतीक्षा, अपार विनम्रता और अटूट भक्ति ने शबरी को वह सम्मान दिलाया
जिसकी अनुभूति केवल सच्चे भक्त ही कर सकते हैं।
राम ने न केवल उसके प्रेम को स्वीकार किया,
बल्कि अपने हाथों से उसके चखे हुए बेर ग्रहण कर
यह सिद्ध कर दिया कि—
“भगवान वस्तु का मूल्य नहीं,
भक्त की भावना का मूल्य देखते हैं।”
शबरी को उसी क्षण मोक्ष प्राप्त हुआ,
और उसकी भक्ति आज भी संसार के लिए प्रेरणा का स्रोत है—
कि यदि मन सच्चा हो, भावना पवित्र हो,
तो भगवान स्वयं मार्ग पर चलकर भक्त के द्वार तक आते हैं।
यही है शबरी की भक्ति का अमर फल।


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