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श्री गणपति अथर्वशीर्ष संपूर्ण हिंदी पाठ

श्री गणपति अथर्वशीर्ष का परिचय

श्री गणपति अथर्वशीर्ष, जिसे गणपति अथर्वशीर्ष के नाम से भी जाना जाता है, वह एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है जो हिंदू धर्म की आध्यात्मिक परंपराओं में गहराई से जुड़ा हुआ है। यह पाठ भगवान गणेश को समर्पित है और इसे वेदों के एक भाग के रूप में माना जाता है। इसकी उत्पत्ति का संबंध वेदों के अंतिम भाग, अथर्व वेद, से है, जो भगवान गणेश के प्रति भक्ति और उसकी महिमा का बखान करता है। यह ग्रंथ केवल एक पूजा सामग्री नहीं है, बल्कि यह उन अनुयायियों के लिए ज्ञान और आत्मिक शांति का स्रोत भी है जो भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं।

अथर्वशीर्ष में गणेश जी की महिमा, उनके दिव्य गुणों और उनके माध्यम से मिलने वाली आशिर्वादों का उल्लेख किया गया है। इस पाठ के पढ़ने से न केवल भक्तों को मानसिक शांति और संतोष मिलता है, बल्कि यह उनके दुःख और कष्टों को दूर करने के लिए भी एक प्रभावी साधना मानी जाती है। शास्त्रीय मान्यता अनुसार, यह ग्रंथ उद्धरण के साथ-साथ मंत्रों का संग्रह भी है, जिनका जाप करने से भक्त भगवान गणेश की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए अथर्वशीर्ष बहुत ही पूजनीय ग्रंथ है। यह धार्मिक आस्था का प्रतीक है और इसे नियमित रूप से पढ़ा जाता है। इसका पाठ न केवल घर में सुख-शांति लाने के लिए किया जाता है, बल्कि इसे विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और त्योहारों के दौरान भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस प्रकार, अथर्वशीर्ष एक ऐसा ग्रंथ है जो सदियों से भक्तों के बीच श्रद्धा और आस्था का केंद्र बना हुआ है।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ

श्री गणपति अथर्वशीर्ष एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है, जिसे भगवान गणेश की स्तुति के लिए लिखा गया है। इस पाठ में कई मंत्रों का समावेश है, जो भक्तों को मानसिक, आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्रदान करने के लिए जाने जाते हैं। इस पाठ के तीन प्रमुख मंत्रों का उल्लेख यहाँ किया गया है, जो जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शुभकामनाएं लाने में मदद करते हैं।

प्रथम मंत्र में भगवान गणेश की महिमा का वर्णन किया गया है। इसे पढ़ने से भक्तों में उत्साह और सकारात्मकता का संचार होता है। यह मंत्र उन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है, जो जीवन में किसी न किसी प्रकार की बाधाओं का सामना कर रहे हैं। इसे “ॐ गं गणपतये नमः” के साथ प्रारंभ किया जाता है, जो इस पाठ का मूल मंत्र है।

द्वितीय मंत्र में भगवान गणेश को ज्ञान और बुद्धि के देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह मंत्र साधक को मानसिक स्फूर्ति और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। इसे नियमित रूप से पढ़ने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, जो सफलता की ओर ले जाती है।
“ॐ एकदंताय नमः” भी इस मंत्र का एक और महत्वपूर्ण भाग है, जो एकदंत भगवान गणेश को समर्पित है।

तृतीय मंत्र बुराइयों और नकारात्मकता को दूर करने पर केंद्रित है। इसका जाप करने से आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और वातावरण में सकारात्मकता का संचार होता है। “ॐ वक्रतुण्डाय नमः” का प्रयोग करते हुए भक्त भगवान से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ सही ढंग से करने के लिए कुछ नियम और विधियाँ अपनाई जा सकती हैं। सबसे पहले, पाठ करते समय एक स्वच्छ और शांत स्थान का चयन करना आवश्यक है। साथ ही, पाठ से पूर्व स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनना भी महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त, श्रद्धा और समर्पण के साथ पाठ का उच्चारण करते समय ध्यान केंद्रित करना चाहिए। नियमित अभ्यास से यह पाठ प्रभावी होता है और भक्तों को उन सभी लाभों का अनुभव होता है, जिनकी उन्हें आवश्यकता है।

अथर्वशीर्ष का महत्व और लाभ

श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जिसे गणेश जी की उपासना के लिए किया जाता है। यह पाठ न केवल आध्यात्मिक रूप से लाभकारी है, बल्कि यह मानसिक शांति, समृद्धि, और सफलता के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। अनेक भक्तों ने इस पाठ के माध्यम से अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव किए हैं। धार्मिक ग्रंथों में इस पाठ का उल्लेख महत्वपूर्ण माना गया है, जो इसे विशेष बनाता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो गणपति अथर्वशीर्ष का नियमित पाठ मानसिक शांति प्रदान करता है। भक्ति और श्रद्धा के साथ जब इस पाठ को किया जाता है, तो मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसका प्रभाव एकाग्रता, ध्यान और संतुलन पर पड़ता है, जिससे व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में बेहतर निर्णय ले सकता है। इसके साथ ही, ऐसे कई भक्त हैं जिन्होंने साझा किया है कि इस पाठ के माध्यम से उन्हें तनाव और चिंताओं से मुक्ति मिली है।

आर्थिक समृद्धि और सफलता के संदर्भ में, अनेक उपासक मानते हैं कि नियमित रूप से अथर्वशीर्ष का पाठ करने से व्यक्तिगत और व्यावसायिक क्षेत्रों में तरक्की संभव है। कुछ भक्तों ने अपने अनुभव साझा किए हैं कि उन्होंने इस पाठ को नियमित रूप से करने के बाद न केवल वित्तीय समस्याओं का समाधान पाया, बल्कि उनके व्यवसाय में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई।

इस प्रकार, धार्मिक ग्रंथों और भक्तों के अनुभवों के आधार पर, श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ न केवल एक आध्यात्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह भौतिक स्तर पर भी सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रभावी माध्यम है।

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अथर्वशीर्ष पाठ से जुड़ी धार्मिक परंपराएँ

श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ का धार्मिक महत्व भारतीय संस्कृति में अत्यधिक गहरा है। यह पाठ न केवल भगवान गणेश की आराधना का एक तरीका है, बल्कि यह विभिन्न धार्मिक परंपराओं और रिवाजों का भी प्रतीक है। भारत की विविध संस्कृतियों में इस पाठ का आयोजन कई अवसरों पर किया जाता है, जैसे गणेश चतुर्थी, विनायक चतुर्थी, और अन्य शुभ अवसरों पर। धार्मिक आयोजनों में, श्रद्धालु अर्चना के साथ पाठ का सामूहिक पाठ करते हैं, जिससे समुदाय में अध्यात्मिक एकता की भावना बढ़ती है।

अथर्वशीर्ष पाठ का आयोजन जब सामूहिक रूप से किया जाता है, तो इसकी तैयारी में निश्चित रूप से कुछ विशेष बातें शामिल होती हैं। श्रद्धालु प्रायः स्वच्छता का ध्यान रखते हैं और पूजा स्थान को सजा कर, वहां भगवान गणेश की प्रतिमा को स्थापित करते हैं। इसके बाद, दीपक जलाने, फूल चढ़ाने और नैवेद्य अर्पित करने के साथ पाठ का आयोजन किया जाता है। यह एक शांति और समर्पण का माहौल उत्पन्न करता है। सामूहिक पाठ के दौरान श्रद्धालु गाने और भजन गाकर एक साथ मिलकर आराधना करते हैं, जो एक अपने आप में सुखद अनुभूति का अनुभव कराता है।

विविध संस्कृतियों में, विशेष रूप से महाराष्ट्र, उत्तर भारत और दक्षिण भारत में, अथर्वशीर्ष पाठ की अलग-अलग पद्धतियाँ और रिवाज हैं। कुछ स्थानों पर, यह पाठ विशेष रूप से श्री गणेश की कृपा के लिए किया जाता है, ताकि बाधाएं दूर हों और समृद्धि में वृद्ध‍ि हो। यह पाठ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत और सामूहिक पूजा का एक अद्वितीय तरीका है जो श्रद्धालुओं की आध्यात्मिक यात्रा को और अधिक समृद्ध बनाता है। इस प्रकार से, श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ विभिन्न धार्मिक परंपराओं और रिवाजों के साथ गहरे रंग में बुनता हुआ है।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष
श्री गणपति अथर्वशीर्ष – पूर्ण पाठ हिंदी में

श्री गणपति अथर्वशीर्ष – पूर्ण पाठ हिंदी में

ॐ अस्य श्री गणेशाय अथर्वशीर्षस्य
श्री गणेशाय नमः॥

1. मूल मंत्र

त्वमेव केवलं कर्ताऽसि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्॥

2. सत्य वचन

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।

3. सर्व दिशाओं में सुरक्षा

अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्॥

4. ब्रह्म, ज्ञान और आनंद स्वरूप

त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥

5. सृष्टि और तत्व

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिवाक्पदानि॥

6. गुण, अवस्था और देवता

त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्॥

7. गणेश विद्या और मंत्र

गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सं हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:॥

8. एकदंत मंत्र

एकदंताय विद्‍महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात॥

9. गणपति ध्यान

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।
एवँ ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:॥

10. नमस्कार मंत्र

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:॥

11. अथर्वशीर्ष का महत्व

  • इसका पाठ करने वाला ब्रह्मभूयाय कल्पित होता है।
  • वह सभी विघ्नों से मुक्त रहता है।
  • सभी प्रकार के सुख को प्राप्त करता है।
  • पंचमहापाप से मुक्त होता है।

12. समय और परिणाम

  • शाम को पाठ करने वाला दिन के पाप नष्ट करता है।
  • प्रात: पाठ करने वाला रात के पाप नष्ट करता है।
  • दिन-रात निरंतर पाठ करने वाला अपापी होता है।
  • सभी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को प्राप्त करता है।

13. शिष्य और साधक हेतु निर्देश

इसे शिष्य को न दें।
मोह से पढ़ने वाला पापी होगा।
सहस्रावर्तन तक इसे पढ़ने वाला इच्छित फल प्राप्त करता है।

14. विशेष उपाय

  • दूर्वा, लाजि, मोदक, साज्यसमिधि से यज्य करने वाला विद्वान, यशवान और मेधावान बनता है।
  • सूर्यवर्चस्वी बनता है।
  • महाविघ्न, महापाप और महादोष से मुक्त होता है।

15. उपसंहार मंत्र

ॐ सहनाव वतु सहनो भुनक्तु सहवीर्यं करवावहे
तेजस्वी नावधितमस्तु मा विद्विषामहे॥

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6 Comments

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