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शिव रुद्राष्टकम पाठ: लाभ, महत्व और सम्पूर्ण हिंदी अर्थ

शिव रुद्राष्टकम का परिचय

शिव रुद्राष्टकम, भगवान शिव की महिमा का अद्भुत स्तोत्र है। यह गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित माना जाता है। इसमें भगवान शिव के अनंत स्वरूप, उनकी कृपा और दिव्यता का वर्णन किया गया है। भक्त इसे श्रद्धा से पढ़ते हैं तो उन्हें मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

शिव रुद्राष्टकम का महत्व व लाभ

  • आध्यात्मिक लाभ: मन को एकाग्र और पवित्र बनाता है।
  • मानसिक शांति: तनाव और चिंता को दूर करता है।
  • संकट निवारण: जीवन की बाधाओं को दूर करने में सहायक।
  • शारीरिक कल्याण: सकारात्मक ऊर्जा से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

शिव रुद्राष्टकम का अर्थ

इस स्तोत्र में कुल आठ श्लोक हैं, जिनमें शिव के गुण, स्वरूप और कृपा का गान है।

  • पहले श्लोक में शिव को निराकार और सर्वव्यापी बताया गया है।
  • दूसरे में उनकी दयालुता और कृपा का वर्णन है।
  • तीसरे और चौथे श्लोक में शिव की दिव्य शक्ति और संकट निवारण स्वरूप की स्तुति है।
  • शेष श्लोकों में शिव की अनंत महिमा और भक्तों के जीवन पर उनके सकारात्मक प्रभाव को दर्शाया गया है।

शिव रुद्राष्टकम का पाठ कैसे करें

  • प्रातःकाल या सांध्य समय शांत और स्वच्छ स्थान पर श्रद्धा भाव से पाठ करें।
  • दीपक, अगरबत्ती और पुष्प अर्पित कर भगवान शिव का ध्यान करें।
  • भक्ति और समर्पण भाव से पाठ करने पर शीघ्र फल प्राप्त होता है।
शिव रुद्राष्टकम

🕉️ श्री शिव रुद्राष्टकम (गोस्वामी तुलसीदास कृत)

श्लोक 1

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम् ॥

भावार्थ:
मैं उस शिव को प्रणाम करता हूँ जो स्वयंभू, निर्गुण, निराकार, इच्छारहित और चेतन आकाश में निवास करने वाले हैं। वे सभी विचारों से परे हैं और अनंत शांति के स्वरूप हैं।


श्लोक 2

निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम् ॥

भावार्थ:
शिव निराकार हैं, ओंकार के मूल हैं, चौथे (तुरीय) अवस्था के स्वरूप हैं। वे पार्वतीपति, गिरीश हैं, महाकाल भी हैं और कृपालु भी। मैं उस गुणों के भंडार शिव को प्रणाम करता हूँ, जो संसार सागर से पार ले जाते हैं।


श्लोक 3

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥

भावार्थ:
जिनका शरीर हिमालय की तरह गौरवर्ण और गंभीर है, जिनका सौंदर्य करोड़ों कामदेवों को मात देता है। जिनके जटाओं में गंगा बह रही है, मस्तक पर चंद्रमा और कंठ पर सर्प शोभा पा रहे हैं — मैं उन शिव को प्रणाम करता हूँ।


श्लोक 4

चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

भावार्थ:
जिनके कानों में झूलते कुण्डल, उज्ज्वल और विशाल नेत्र, प्रसन्न मुख और नीलकण्ठ स्वरूप है। जिनका वस्त्र सिंहचर्म है और गले में मुंडमाला सुशोभित है — मैं उन सबके स्वामी, शंकर का भजन करता हूँ।


श्लोक 5

प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम् ।
त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम् ॥

भावार्थ:
वे प्रचण्ड, तेजस्वी, पराक्रमी, परमेश्वर, अजन्मा और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं। हाथ में त्रिशूल धारण किए हुए, भवानीपति उन शिव का मैं भजन करता हूँ।


श्लोक 6

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सच्चिदानन्द दाता पुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥

भावार्थ:
हे शिव! आप कालातीत हैं, कल्याणकारी हैं और प्रलय के भी स्वामी हैं। आप सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, त्रिपुरासुर संहारक हैं, मोह का नाश करने वाले हैं और कामदेव को जीतने वाले हैं। प्रभु! प्रसन्न होइए।


श्लोक 7

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ॥

भावार्थ:
जब तक मनुष्य उमा पति शिव के चरणारविन्द का भजन नहीं करता, तब तक उसे न सुख मिलता है, न शांति और न ही संताप का नाश। हे सर्वभूतों के वास! प्रसन्न होइए।


श्लोक 8

न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम् सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम् ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ॥

भावार्थ:
हे प्रभु शंभो! मुझे न योग आता है, न जप, न पूजा। मैं तो सदैव आपको ही नमस्कार करता हूँ। जन्म-मरण और दुखों से पीड़ित मैं आपकी शरण आया हूँ — कृपया मेरा उद्धार करें।


फलश्रुति

रूद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये
ये पठन्ति नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसीदति।।

भावार्थ:
यह रुद्राष्टक ब्राह्मणों के आनंद हेतु कहा गया है। जो मनुष्य इसे भक्ति भाव से पढ़ते हैं, उन पर भगवान शिव अवश्य प्रसन्न होते हैं।

👇 शिव रुद्राष्टकम का पाठ सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें:

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❓ शिव रुद्राष्टकम FAQ

1. शिव रुद्राष्टकम किसने लिखा है?

➡️ शिव रुद्राष्टकम का रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी को माना जाता है।

2. शिव रुद्राष्टकम का पाठ कब करना चाहिए?

➡️ इसे प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्याकाल में करना श्रेष्ठ है। सोमवार और महाशिवरात्रि पर इसका विशेष महत्व है।

3. शिव रुद्राष्टकम का पाठ करने के क्या लाभ हैं?

➡️ मानसिक शांति, रोगों से मुक्ति, पारिवारिक सुख-समृद्धि, और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है।

4. क्या शिव रुद्राष्टकम का पाठ घर पर किया जा सकता है?

➡️ हाँ, इसे घर पर, मंदिर में या किसी भी पवित्र स्थान पर श्रद्धा भाव से पढ़ा जा सकता है।

5. शिव रुद्राष्टकम कितने श्लोकों का है?

➡️ यह स्तोत्र कुल 8 श्लोक का है।

6. क्या शिव रुद्राष्टकम का अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध है?

➡️ हाँ, इसका अनुवाद कई भाषाओं में मिलता है। आप इसे हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों रूपों में पढ़ सकते हैं।

7. क्या शिव रुद्राष्टकम का पाठ करने के लिए कोई विशेष नियम है?

➡️ मुख्य नियम है भक्ति और श्रद्धा। स्वच्छता बनाए रखना, शांत वातावरण चुनना और भगवान शिव का ध्यान करना ही पर्याप्त है।

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