पशुपति स्तोत्रम् | Pashupati Stotram with Meaning | Mahadev Panchvaktra Stuti

पशुपति स्तोत्रम् (Pashupati Stotram) महादेव के पंचवक्त्र, त्रिनेत्र, नीलकण्ठ और अनन्त ब्रह्मस्वरूप की स्तुति है। इस पोस्ट में आपको पूरे संस्कृत श्लोक, विस्तृत हिन्दी अर्थ, आध्यात्मिक लाभ और इस स्तोत्र के गूढ़ रहस्यों का सुंदर वर्णन मिलेगा। यह स्तोत्र शिवभक्तों के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना गया है। Bhajan Dhaara द्वारा प्रस्तुत।
पशुपति स्तोत्रम् i
Presented by Bhajan Dhaara
भगवान शिव को समर्पित अनेकों स्तोत्रों में पशुपति स्तोत्रम् अत्यंत प्रभावशाली और दिव्य माना जाता है।
यह स्तोत्र भगवान के पंचवक्त्र स्वरूप, त्रिनेत्र, जटाजूट, नीलकण्ठ, और विश्वव्यापी ब्रह्मस्वरूप का अद्भुत वर्णन करता है।
महर्षियों के अनुसार —
जो भक्त इस स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, उसके जीवन से भय, दुख, पाप और बाधाएँ दूर होती हैं, और महादेव की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।
नीचे पूरा स्तोत्र, विस्तृत अर्थ और लाभ प्रस्तुत हैं।

📿 पशुपति स्तोत्रम् – Pashupati Stotram — Full Sanskrit Lyrics
1.
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम॥1॥
2.
महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्॥2॥
3.
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्॥3॥
4.
शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप॥4॥
5.
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥5॥
6.
न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे॥6॥
7.
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम्॥7॥
8.
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्॥8॥
9.
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य:॥9॥
10.
शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि॥10॥
11.
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्व-रूपिन्॥11॥
📘पशुपति स्तोत्रम् विस्तृत हिन्दी अर्थ (Long Meaning & Explanation)
श्लोक 1 का अर्थ:
भगवान शिव पशुओं के भी स्वामी हैं, सभी जीवों के पालनकर्ता हैं। वे पापों को नष्ट करने वाले, संसार के परमेश्वर हैं। गजेन्द्र की खाल को वस्त्र के रूप में पहनते हैं और उनकी जटाओं में पवित्र गंगा विराजती है। यहाँ शिव को स्मरारि यानी कामदेव को जीतने वाले कहा गया है — जो मन के विकारों पर विजय का प्रतीक है।
श्लोक 2 का अर्थ:
वे महेश्वर, देवों के देव, असुरों के नाशक और विश्वनाथ हैं। उनका शरीर विभूति से अलंकृत है। उनके तीन नेत्र सूर्य, चंद्र और अग्नि का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंचवक्त्र रूप पाँच तत्वों और पाँच दिशाओं पर उनकी सत्ता का संकेत है।
श्लोक 3 का अर्थ:
वे पर्वतों के ईश्वर, गणों के स्वामी, नीलकण्ठ, नंदी पर आरूढ़ और समस्त गुणों से परे हैं। उनका तेज ऐसा है कि वे स्वयं भस्म से शरीर अलंकृत करते हैं। माँ भवानी उनके साथ सदैव रहती हैं — शिव पार्वती के बिना अपूर्ण नहीं हैं।
श्लोक 4 का अर्थ:
महादेव को यहाँ पूर्ण ब्रह्म कहा गया है। वे विश्व में व्याप्त हैं, रूप-रंग से परे हैं और संसार के सभी रूप उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। भक्त उनसे कृपा की याचना करता है।
श्लोक 5 का अर्थ:
शिव ही परमात्मा हैं—सृष्टि के मूल बीज! वे निराकार हैं, ओंकारस्वरूप हैं, वेदों द्वारा जाने जाते हैं। संपूर्ण विश्व की उत्पत्ति, पालन और लय उन्हीं में होता है।
श्लोक 6 का अर्थ:
शिव किसी भी तत्व या स्थिति से बंधे नहीं हैं। न वे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु या आकाश हैं। वे त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के भी परे हैं — वे परम ब्रह्म हैं।
श्लोक 7 का अर्थ:
वे अजन्मा, शाश्वत, कारणों के भी कारण हैं। वे प्रकाश के भी प्रकाश हैं, तुरीय अवस्था में स्थित हैं — जहाँ अद्वैत ही अद्वैत है।
श्लोक 8 का अर्थ:
महादेव विश्वमूर्ति हैं, चिदानंद स्वभाव वाले हैं, योग से प्राप्त होने वाले हैं। वे ज्ञान के सार हैं। भक्त उन्हें बारंबार नमस्कार करता है।
श्लोक 9 का अर्थ:
हे त्रिनेत्रधारी, हे महादेव! आपके समान कोई पूजनीय नहीं। संसार में कोई भी आपके समान महान नहीं है। आप ही सर्वोच्च हैं।
श्लोक 10 का अर्थ:
वे करुणामय हैं, गौरीपति हैं, पशुपाश (बंधन) को काटने वाले हैं। वे काशी के ईश्वर हैं और संसार के पालन, संहार और सृजन के स्वामी हैं।
श्लोक 11 का अर्थ:
संपूर्ण जगत शिव से उत्पन्न होता है, उनमें स्थिर रहता है और उन्हीं में विलीन हो जाता है। वे चर और अचर—दोनों के आधार हैं। लिंगस्वरूप महादेव ही परम ईश्वर हैं।
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🌟 (पशुपति स्तोत्रम् )Pashupati Stotram Recitation Benefits
1. मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि
इस स्तोत्र का स्पंदन मन को स्थिर और शांत करता है, मानसिक तनाव को कम करता है।
2. नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं का नाश
यह स्तोत्र महादेव के पापनाशक स्वरूप को जागृत करता है, जिससे जीवन की रुकावटें दूर होती हैं।
3. आत्मविश्वास और शक्ति में वृद्धि
शिव के पंचवक्त्र रूप का स्मरण व्यक्ति में आंतरिक साहस, दृढ़ता और आध्यात्मिक ऊर्जा लाता है।
4. आध्यात्मिक उन्नति और ध्यान में सहायता
यह स्तोत्र मन को उच्च चेतना की ओर ले जाता है और ध्यान की गहराई बढ़ाता है।
5. घर-परिवार में सकारात्मकता और शांति
नियमित पाठ करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और वातावरण दिव्य बन जाता है।
6. कर्मबंधन और भय से मुक्ति
पशुपति (पशुओं = जीवों) के स्वामी के रूप में शिव जीवों को बंधनों से मुक्त करते हैं।
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